Press "Enter" to skip to content

आम इंसान से कलाकार बनने तक का अनसुना सफर । Suraj S Dixit

 

ये कहानी जन्म लेती है आम युवा की कलाकार के प्रति बढ़ते लगाव से। समर्थ की बढ़ती आकांशाओ से। अपनी शिक्षा को पूर्ण कर एक अच्छी सी नौकरी करता हुआँ युवा न जाने दोस्तों के बहकावे क्यूँ कुछ बहकने लगता हैं। दोस्तों से अपने कानों में उल्टा सीधा सुनकर गलत मार्ग को चुनता हैं। अच्छे दिखने का लालच जगाकर समर्थ के मित्र उसे नौकरी को छुड़वाकर मॉडलिंग के सपने दिखाने लगते हैं। बिना परिश्रम सब शौक पुरे होते है ये झूठे वादे करने लगते है। युवा अवस्था के कारण समर्थ का अपने चंचल मन पर काबू न था और समर्थ अपने बसे-बसाये परिवार को छोड़ मायानागरी की और बढ़ गया।
सब कुछ छोड़ चुका समर्थ आज चंद पैसों के संग शहर की दहलीज़ पर कदम रख चुका था। मित्रों द्वारा फसाये गए जाल में आज स्वयं फसने चला था। मॉडलिंग के लिए बताये गए पत्ते पर जा पहुँचा। वहाँ जाकर बातें हुई और जा कर ये महसूस हुआ की वहाँ समर्थ की कोई किम्मत ना थी किंतु कहने को कहता किसे अब बस वही उसकी मंजिल थी। किसीने समर्थ पर ज्यादा ध्यान न दिया तब समर्थ को अपने नौकरी और परिवार की पहली बार याद आयी। लेकिन जुनून जो सवार था वो समर्थ को फिर उन यादों से लौटा लाया।
कई महीनों तक रोजाना समर्थ वहाँ जाता मगर उसे न तो काम मिलता और नाही कोई ठीक तरह बात करता।
आज भी रोजाना की तरह समर्थ उस जगह पहुँचा शाम होते होते एक व्यक्ति उसके समीप आकर कहने लगा तुम्हे अंदर बुलाया है। समर्थ अंदर मिलने पहुँचा कुछ बातें हुई और समर्थ को कलाकार और मॉडलिंग के बारे में बताया गया किंतु अपूर्ण जानकारी ही समर्थ को दी गयी।
समर्थ काम मिलने की खुशी में खुश था। आने वाले कल से अज्ञात था।
अगले ही दिन वह काम के लिए बताई गयी जगह पर पहुँचा और वहाँ जाते ही उसे एक पर्चा थंबाया गया। पर्चे को पढ़ कर ही समर्थ हैरान रह गया और सीधा जिन्होंने उसे काम दिया है उनके पास पहुँचा और सवाल करने लगा की यह सारी कुटिल हरकते वे उससे कैसे करवा सकते हैं? अनेक प्रश्न करने के बाद उसे जवाब में फिर एक परचा दिया गया। जिसमें समर्थ के हस्ताक्षर सहित ये लिखा था की इंडस्ट्री द्वारा दिये गए कार्य को कलाकार और मॉडल्स को करना ही होंगा एवं कार्य बताये जाने पर वे पीछे नहीं हट सकते और अगर वे ऐसा करते भी है तो उन्हें डील तोड़ने के फरेब में जुर्माना लगाया जायेगा और कानुन कारवाही भी की जायेंगी। ये सब सुनकर और पढ़कर समर्थ के पास कोई रास्ता न बचा और वह सभी कार्य जो समर्थ के उसूलों के खिलाफ थे एक अभिनेता बनने की चाह में उसे करना पढ़ा। काम देने के वक्त प्रसन्नता में समर्थ के ध्यान न होने का फायदा उठाया गया और हस्ताक्षर का घिनौंना कृत्य काम के नाम पर किया गया।
आज समर्थ कलाकार तो था मगर वो समर्थ नहीं था जो ज़िंदगी अपने आप के मर्ज़ी से जीता था।
आज समर्थ अभिनेता था मगर वो नेता नहीं था जो अपने माँ बाऊजी के उसूलों को लिए एक आदर्श संतान कहलाता था।मजबूरी, लालच, और प्रसिद्धी के जाल ने समर्थ को अपने संस्कारों से मुह मोड़ने के लिए तैयार कर दिया। वो परदे पर एक चहरा बनकर रह गया मगर असली धर्म का चहरा वो अब भूल गया।
बुराई अभिनेता बनने में नहीं लेकिन उसूलों से सौदा जहाँ करना पढ़ जाए उसमें बुराई जरूर है। पहले खुश था छोटे से संसार में अब संसार बढ़ा था मगर खुशियाँ नहीं थी।

Advertisement

Writer:-!!$rj!! :- Suraj S Dixit
Insta id:- Sangharshsuraj

Advertisement

Be First to Comment

    Leave a Reply