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कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं | चंदन अंजू मिश्रा

 

जब भी वक़्त के पन्ने पलटती हूँ,
जब भी बचपन की गली से गुजरती हूँ,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।

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न जाने सब कहाँ खो गए,
वक़्त ने सबको दूर किया।
इस दो वक़्त की रोटी ने,
देखो सबको मजबूर किया।
जब भी बचपन के दरीचे में झाँकू,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।

जिनके संग बचपन गुज़ारा,
झूले संग पेड़ों ओर झूले।
अब सूट बूट वाले हुए सब,
लगता है जैसे दोस्तों को ही भूले।
इस आपाधापी भरी जिंदगी में,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।

नहीं मिलता चैन कहीं भी,
जो मिलता जब दोस्त संग थे।
रंगहीन लगता है जीवन अब,
दोस्तों ने ही तो भरे इसमें रंग थे।
जब भी मेरी आँखें छलके,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।

इस मतलब वाली दुनिया में,
वही यार तो मेरे सच्चे थे।
जब स्वार्थ की समझ नहीं थी,
दिमाग से भी हम कच्चे थे।
जब कभी मन व्याकुल हो जाता,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।

काश वक़्त को थाम लेती,
बचपन के उस दौर में।
मिलता था सुकून जब,
अम्बिया के छाँव की ठौर में।
जब जब गली के बच्चों को देखूँ,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।

न जाने वो दोस्त कब मिलेंगे,
कब मिलेगा फिर वो चैन ।
बीत रहे हैं इसी उम्मीद में,
मेरे हर दिन और रैन ।
मेरे अपनों से भी अपने,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।

मिली जब भी उनसे मैं ,
शिकायत खूब लगाऊँगी।
क्यों इतने दूर रहे सब,
डाँट भी सबको सुनाऊँगी।
आँखों से समझते थे जो हाल मेरा,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं,
वो सच्चे दोस्त बहुत याद आते हैं।

-©चंदन अंजू मिश्रा
unheard_jazbaat

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