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कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं|नरेश सिंह नयाल

 

तुम लोग सच में
बहुत सताते हो
सब अपने-अपने कामों में हो
देखता रहता हूँ
सुनता रहता हूँ
तुम सब अपने-अपने क्षेत्र में
बहुत अच्छा कर रहे हो
अच्छा लगता है
पर सुन लो
तुम तब भी वही थे
और आज भी वही हो,

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बड़े बेकार हो तुम
ये तब की बातें हैं
जब सारे हमसे कहा करते थे
जब झुंड बनाकर
कॉलर चढ़ाकर
उन पर अखियों से ही
सटीक निसाना लगाकर
गलियों में हम फिरा करते थे
हो कोई भी
हमसे चूक न होती थी
नए ‘चेहरे’ पर हमेशा
पहले मैं पर ही बहस होती थी
तब वो भी अपने
दोस्तों संग फ़िज़ाओं में
अदाएं लेकर फुर्र हो जाती थी,

अच्छा याद है ना
चाय से पहले
बिस्कुट की प्लेट आती थी
उस निगाहें कम
आतंकी हमले की
सेंध लगा करती थी
अरे यार कभी-कभी तो
आते ही तुम सभ्य बन जाते थे
आंटी जी लाइए
मैं रख दूंगा कहकर
उनकी तरफ बड़ जाया करते थे
पर कसम से
तुम ही सबसे बड़े लुटेरे हो
इस टैग के संग
कभी भी पकड़े नहीं जाते थे,

फिर वो छिपकर सिनेमा जाना
सुट्टे के बिन दोस्ती को
हमेशा अधूरी ही कहना
अपनी शर्ट में सजकर निकलना
मिलते ही दोस्तों के
अबे क्या गजब है कहकर
पल में ही बदलकर पहन लेना
फिर पार्टियों में
बाज की नजर लेकर
थोड़ी देर और
बस थोड़ी और कहकर
तीर निसाने पर लगाए रहना
कोई और बीच में आ जाए
तो शेरखान बनकर बिदकना
कुकुर से थे तुम सब
और मैं भी तो,

अच्छा बताओ
पैसों का हिसाब कैसे होता था
रखने वाला हमेशा ही
सबसे ईमानदार बन जाता था
पर हम चुनते भी तो उसी को थे
जिस पर जरा सा
बिलकुल जरा सा
आखिर दोस्त है हमारा
शक मन में होता था
उसकी मेहरबानी पे ही
पूरा सफर निकल जाता था
किसने क्या खाया
इसका हिसाब तो बस
उसी के पास ही रहता था,

पर यार
किसी पर मुसीबत आ जाए
या किसी के घर पर
परेशानी कोई हो जाए
तो वहीं पड़े रहते थे
बेख़ौफ़ होकर मुश्किल को
सब मिलकर डराते रहते थे
कहाँ तब घण्टों या दिनों का
हिसाब लगाया करते थे
हम यार सच्चे होते थे
बस यारी किया करते थे
रिश्तों में यारी को
हमेशा ही हम
सबसे ऊपर रखा करते थे,

तुम लोग ना
सच में बहुत बुरे हो
याद को भी नहीं छोड़ा
उस पर कब्जा जमा लिया है
कुछ भी याद करो
बस याद तुम ही आते हो
याद तुम्हारी ही आती है
तब मानो जिन्दगी फिर से
लम्हे दोहराने लगती है
एक पिक्चर सी दिखाने लगती है,

व्व नुक्कड़ की चाय
वो दूसरी गली के
तीसरे मकान की ‘हाय’
बालों का फैशन
कुछ छिन जाए
तो हंसी वाली चुभन
यारी में किसी से भी लड़ना
ना चाहकर भी
पंगों में हाथ डाल देना
अपने दोस्त की नाक की खातिर
खुद सूली पर चढ़ जाना
स्कूल की आशिक़ी को
कॉलेज में जाकर हूल देना
किसी के आवारा कहने पर
ज़िन्दगी के अपने ही
फ़लसफ़े उसको देर तक समझाना,

याद आता है सच में
यारों की यारी का
वो गुजरा हुआ
एक ज़माना
तुम यार अनमोल
तुम्हारी यारियों का
वो सारा था
एक मीठा सा घोल
याद आता है यारो
हमारी यारियों का
वो गुजरा जमाना।

…………………….
©नरेश सिंह नयाल
देहरादून उत्तराखंड

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One Comment

  1. Naresh Singh Nayal Naresh Singh Nayal October 7, 2020

    इतना प्यार देने के लिए शुक्रिया टीम ” कला और कलम ”

    नरेश सिंह नयाल

     

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