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चिट्ठी | नरेश सिंह नयाल

 

आज चिट्ठी खुद की लिखी खोल ली,
जिनको लिखी थी उन्हीं के लिए बोल दी,
उससे पूछा तू क्यों नहीं गई ,
भला यहीं कैसे रह गई ,
वो चिट्ठी इतराई जरा लज्जाई,
अपने धूल की दुशाला से बाहर आई,
फिर बोली कैसी बात करते हो ,
मैंने अपने सगे संबंधियों को भेजा तो,
तुमने ही मुझे बिन पते के यहीं रख दिया ,
भावनाओं का समंदर सारा उभार दिया ,
अंदर कलेजा मानो निकाल दिया ,
पर बाहर चंद अक्षरों में ,
फिर तुम्हारा ही हाथ कांप गया ,
तुम इक्कीस के थे तब ,
मुझे सजाया था तुमने जब ,
मस्तक पर मां का आशिर्वाद ,
दाए अपना ठिकाना लिखा ,
उसके ऊपर तारीख भी अंकित की ,
बांए लिखा प्रेम का अल्फ़ाज़,
फिर मुझे प्यार से गोद दिया ,
मेरे पूरे जहन में तुमने तो ,
बस अपना ही प्यार उभार दिया ,
फिर अंत में जी लिख कर बन्द किया ,
अच्छा हुआ जो तुमने मुझे ,
बिन पते के ही अपनी ही ,
एक फाइल में दबा लिया ,
आज जो सामने है तुम्हारे ,
शायद मुझे समय पर पाकर न होती,
मैं पूरी चिट्ठी उनकी ही,
जुल्फों की छांव में पड़ता था ,
पर उस अंतिम पंक्ति को हमेशा ही ,
पढ़े बिना आगे बड़ जाता था ,
आज उन्होंने भी जिद की थी,
इसलिए चिट्ठी भी मचली थी ,
मैंने फिर एक मुस्कान को ,
अपने होंठों पर बुलाया ,
चिट्ठी में लगी धूल को ,
जरा और साफ किया ,
उनकी आंखों ने मेरी आंखों में ,
खुद को ठहराया गड़ाया,
मैंने चिट्ठी को सहलाया और पढ़ा,
‘ तुम्हें यह मेरी अंतिम चिट्ठी है ‘
वो सुनकर ना गुस्साई ,
ना कोई नाराजगी जताई ,
चिट्ठी फिर मेरे हाथों में मचली ,
उन्होंने कसकर मेरी बाहें थाम ली ,
बस उसी दिन उस चिट्ठी ने ,
मेरे चंगुल से आजादी पाई थी ,
उन्होंने मुस्कुराकर उस चिट्ठी को,
हवा की सैर कराई थी ,
वो चिट्ठी मानो अरमानों के पंख लिए,
अपने असल वजूद ,
उस जंगल में समाई थी ,
वो अंतिम चिट्ठी उनके नाम बिना ,
प्रकृति में विलीन हो गई थी।

…………………………………..
© नरेश सिंह नयाल
देहरादून उत्तराखंड
IG: nareshsinghnayal

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