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तुम भी ना….|नरेश सिंह नयाल

 

मैं पति ही नहीं
श्रृंगार हूँ तुम्हारे जीवन का
मान्यताएं कहती हैं
ईश्वर ऊपर है
पर धरा पर उसका ही रूप
परमेश्वर हूँ तुम्हारा
तुम्हारे सिर के बीचों बीच
चलती हुई लकीर हूँ
जिस आईने के सामने
तुम रोज इतराया करती हो
उसकी ही तहरीर हूँ
वर्तमान का आधार
और भविष्य की तस्वीर हूँ
तुम्हारी बलखाती अदाओं का
मैं एकमात्र कारण हूँ
संकट के पलों में
अडिग आभास हूँ
तुम्हारे उलझे प्रश्नों का
मैं मौन जवाब हूँ
सागर मैं उतारी है
तुमने जो ये नैया
उसकी मैं पतवार हूँ
तुम्हारी कलाइयों में
सजती रंग बिरंगी चूड़ियों की
मैं सुरीली झनकार हूँ
तुम्हारी प्रत्येक पुकार की
मैं ही ललकार हूँ
पर संगिनी तुम भी तो
ढलते सूरज संग
मेरे घर लौटने का
अनन्त कारण हो
जीवन रूपी नैया की
तुम ही तो खेवैया हो
डगमगाते कदमों का मेरे
तुम ही दृढ़ संकल्प हो
चल रही हैं जो साँसें निरंतर
उसका दूसरा कारण हो
खुशहाल है जो जीवन इतना
तुम ही उसकी तकदीर हो
चलते हुए कदमों की
तुम ही सुरीली चाप हो
हमारे किये गए कृत्यों की
तुम ही अमिट छाप हो
जो तलाश चल रही थी हमारी
तुम ही उसका
सुफल परिणाम हो
साथी हम एक दूसरे के पूरक
एक दूजे के अरमान हैं
जिंदगी के गीतों की
हम सुरीली तान हैं
मेरी चलती हुई कविताओं की
साथी तुम ही तो शब्दावली हो।

© नरेश सिंह नयाल
देहरादून, उत्तराखंड
IG:nareshsinghnayal

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