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मैं सोने गयी, और मेरा फोन रिंग करता है| Nilofar Farooqui Tauseef

 


मैं सोने गयी, और मेरा फ़ोन रिंग करता है, धड़कन अपनी रफ्तार से तेज़ गति की ओर बढ़ती है, मन-मस्तिष्क में अजीब व ग़रीब ख्यालात आ रहे थे। अभी क्या हुआ होगा? किसने फोन किया? हाथों से टटोलते हुए फोन हाथों में उठाया और एक आँख बंद किये दूसरी आँख खोली, जहाँ नम्बर सिर्फ दिखाई दे रहा था। शायद किसी अनजान का फोन था जिसका नम्बर मोबाइल में नहीं था।

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अनजान नम्बर देखते ही, दूसरी आँखें भी अचानक खुल गयी और सहमते हुए कान तक फोन लगाया और कॉल रिसिव किया।

मैं हेलो बोल पाती इससे पहले ही आवाज़ आयी “चल तू निकल बाहर तुझे अभी अकड़ दिखाता हूँ” ये सुनते ही मेरे हाथ से मोबाइल गिर गया, मै पसीने-पसीने इधर उधर भागने लगी, समझ नही आ रहा था क्या करूँ? तभी दरवाज़े की रिंग बजी टिंग टोंग . दिल व दिमाग़ दोनों बेचैनी लिए था। तभी फोन रिंग बजी, धिरे-धीरे आगे बढ़ी देखा पापा की फोन थी, काँपते हाथों से उठाया और रिसिव किया तभी आवाज़ आयी।— बेटा कहाँ है तू, कब से फोन कर रहा हूँ दरवाजा खोल। मैं बाहर खड़ा हूँ।

दौडते हुए दरवाजा खोला पापा को देख गले लगकर रोने लगी। वो थोड़ा घबराए और पूछा क्या हुआ? फोन की बात बताई और ये भी बताया के रास्ते पे चार लड़के कैसे बदतमीज़ी कर रहे थे जब मैं कॉलेज से आ रही थी।

पापा ने कहा बेटा तू हमारी इज़्ज़त है हम नही चाहते के कुछ हो इसलिए अब तू कल से कॉलेज नही जाएगी, माँ के काम में हाथ बंटायेगी। मैं कुछ कह पाती पापा ने नही में सिर हिला दिया।

वो रात वही थम गई, फिर सवेरा आया पर मेरी ज़िंदगी का नहीं। एक फ़ोन ने सब तबाह कर दिया था। आज भी लगता है क़सूर क्या था मेरा, क्या लड़कियों का हक कुछ भी नहीं!

आज फिर उन लम्हो को याद करते सो गई।

©Nilofar Farooqui Tauseef
Fb, IG-writernilofar

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